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रविवार, 28 जून 2020

Book :Synthetic Solution : Philosophical Approach By Chetan Kumar



A common question always arises in the minds of every college student in India that relates to our own way of  development. We are continuously gathering all kinds of knowledge from Europe and America. If we study Indian philosophy, sciences, mathematics, etc., we get the ancient knowledge but not the new concepts and ideas which define our life in modern times. Even our traditional psychologists and philosophers like Sad Guru and Ravishankar, who are known as spiritual masters, simply serve us the old traditions of Indian thought. Even Gandhiji followed the same traditional principle of non-violence which emerged from Syadvada theory of Jaina. However, he synthetized this theory with civil disobedience and satyagrah. a. These theories of Gandhi are based on the ideas Leo Tolstoy and Christian ethics.
In the similar manner I will synthesize Indian and western concepts at multiple levels in different chapters. I had chosen Descartes mind-body problem, and will be trying to resolve it with Veda ntic and Samkhya approach under the impression of Jaina philosophy.
I have no intention of showing inadequacies in western philosophy. In fact, it was the greatness of Descartes from whose introspection emerged such an interesting philosophical problem. This problem can also be seen in Greek philosophy, in the book Phaedo of Plato. Moreover, the philosophers just prior to Descartes pro- pounded the same ideas, but the credit for the formulation of ‘I think therefor I am’ goes to Descartes alone.
Actually, we synthesis and interpret multiple ideas to arrive  at  something  new.    It  is  the  reason  that  the  newness  is  an  invention  and  not  a  Discovery.  By  analytical approach  we  can  discover  the  simple  substances  of  a  new invention. In  this  way,  I  attempt  to  show  that  Indian  Philosophy  is  rich,  and  there  is  no  truth  in  the  perception  that nothing  new  has  been  found  in  the  Indian  philosophy. We  are  obliged  to  develop  new  ideas  and  concepts through  the  process  of  synthesis. An  enormous  literature  had  emerged  in  Europe  to delineate  and  resolve  the  ‘Mind  body  problem’  of Descartes,  all  of  them  seek  to  define  the  scope  of  the  problem.  However,  most  of  them  do  not  fulfill  their  objectives.  Hence,  I  make  an  effort  to  resolve  the  problem and  I  will  present  a  synthetic  solution  of  the  Mind-body problem  of  Descartes  from  all  possible  angles.
Chetan Kumar (PhD), Research Scholar

Department of Philosophy University of Delhi.

गुरुवार, 14 नवंबर 2019

गुरु नानक देव जी का मानवतावादी दर्शन (Humanist Philosophy of Shri Guru Nanak Devji )

डॉ देशराज सिरसवाल 


गुरु नानक देवजी सिखों के पहले गुरु थे। अंधविश्वास और आडंबरों के कट्टर विरोधी गुरु नानक जी का जन्मदिन कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है हालांकि उनका जन्म 15 अप्रैल 1469 को हुआ था। गुरु नानक जी पंजाब के तलवंडी नामक स्थान पर एक किसान के घर जन्मे थे। तलवंडी जोकि पाकिस्तान के लाहौर से 30 मील पश्चिम में स्थित है, गुरु नानक का नाम साथ जुड़ने के बाद आगे चलकर ननकाना कहलाया। इतिहास के अनुसार वे सम्पूर्ण विश्व में भ्रमण करते रहे और लोगों को आडम्बर,  भ्रम एवं अज्ञान से दूर कर उनका मार्गदर्शन करते रहे ताकि उनका परिचय ‘आत्मा’ और परमात्मा से हो सके एवं सर्वत्र प्रेम और भाईचारा प्रसारित हो सके, मानव और उनका समाज स्वस्थ रह सकें । उनके जीवन से जुड़े असंख्य प्रेरक प्रसंग हैं जो इन तथ्यों की सम्पूर्ण पुष्टि करते हैं । इस शोध-पत्र का मुख्य विषय गुरु नानक देव जी के मानवतावादी दर्शन का अध्ययन करना है ।

गुरु नानक जी के उपदेश
गुरु नानक जी ने अपने अनुयायियों को दस उपदेश दिए जो कि सदैव प्रासंगिक बने रहेंगे। गुरु नानक जी की शिक्षा का मूल निचोड़ यही है कि परमात्मा एक, अनन्त, सर्वशक्तिमान और सत्य है। वह सर्वत्र व्याप्त है। मूर्ति−पूजा आदि निरर्थक है। नाम−स्मरण सर्वोपरि तत्त्व है और नाम गुरु के द्वारा ही प्राप्त होता है। गुरु नानक की वाणी भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से ओत−प्रोत है। उन्होंने अपने अनुयायियों को जीवन की दस शिक्षाएं दीं जो इस प्रकार हैं− 
1. ईश्वर एक है। 
2. सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो। 
3. ईश्वर सब जगह और प्राणी मात्र में मौजूद है। 
4. ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय नहीं रहता। 
5. ईमानदारी से और मेहनत कर के उदरपूर्ति करनी चाहिए। 
6. बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को सताएं। 
7. सदैव प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने लिए क्षमा मांगनी चाहिए। 
8. मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए। 
9. सभी स्त्री और पुरुष बराबर हैं। 
10. भोजन शरीर को जि़ंदा रखने के लिए ज़रूरी है पर लोभ−लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।1
गुरू नानक सत्य के पुजारी थे और उन्होंने धर्म  का विवेचन करने के लिए जो कुछ कहा है, वह आडबंरयुक्त वचनों और वाक्छल से रहित  है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि ‘‘धर्म  के विषय में लंबी- चौड़ी बातें करने से कोई लाभ नहीं। सिद्धांत वही सच्चा है और ठीक माना जा सकता है, जो व्यवहार में लाया जा सके।’’2  चाहे कोई पूजा- पाठ, जप- तप योगादि कितना भी करे, पर नानक जी की दृष्टि  में यदि  वह लोगों का उपचार- पीड़ि़तों की सेवा नहीं करता तो वह सब महत्त्वहीन है। वे तिब्बत  तक गये थे और हिमालय  के दुगर्म प्रदेशों में पहुँचकर सिद्ध  योगियों  से भेंट की थी। उन सिद्धों  से भी उन्होंने यही कहा था कि ‘‘आप तो यहाँ मोक्ष की साधना में लीन है और वहाँ संसार की दशा यह है कि समय के समान घातक हो रहा है। शासक गण कसाई बन गए हैं। धर्म  पंख लगाकर उड़ गया है, चारों तरफ झूँठ की काली रात छाई हुई है, उसमें सच्चाई का चंद्रमा कहीं दिखाई नहीं देता है।3’’ सिख धर्म में सामाजिक जीवन मुल्यों पर बहुत बल दिया गया है. जैसा की गुरू नानक देब जी कहते हैं की “पहाड़ों , गुफा  कन्दराओं में जाकर अपने आपको (आत्म) खोजने की जरूरत नहीं”. केवल नेक कर्मों जैसे जरुरतमन्द की सहायता और समाज सेवा से ही व्यक्ति ओने आपको पहचान सकता है. व्यक्ति केवल परोपकार के द्वारा ही इंसानी भाईचारे को विकसित कर सकता है.     
सिख धर्म में परोपकार के नैतिक नियम को इन्सान का महत्वपूर्ण सद्गुण माना गया है इसे सिख नीतिशास्त्र का स्तम्भ माना गया है . परोपकार यानि दूसरों की भलाई . यह दो शब्दों के मेल से बना है पर यानि दूसरा , उप , उपसर्ग है कर यानि कि करना . पर +उप+कार= परोपकार अर्थात दूसरों की भलाई . इसके भी दो पक्ष हैं. दूसरों के प्रति की गई शारीरिक सेवा एवम अध्यात्मिक सेवा. गुरु नानक देव जी कहते हैं की “परोपकार ही सम्पूर्ण शिक्षा का सार है.”4 नानक जी मानते थे कि भलाई, सज्जनता आदि  का गुण मनुष्य में स्वभावतः होता है। पर वह अनुकूल स्थिति  न पाने के कारण छिपा  रहता है। सच्चे संतों, सद्गुरू का कत्तर्व्य है कि वह इस भलाई के तत्त्व से मनुष्य को पिरिचत करायें और उसके बढ़ाने में मदद करें। यही गुरू का सबसे बड़ा उपकार शिष्य  पर होता है, जिसके लिए  वह गुरू को भगवान् के तुल्य समझकर पूजता है। हम कह सकते हैं कि जात- पात के बंधनों, खान- पान में चौका- चूल्हे के नियमों  और छुआछूत की बीमारी को सबसे अधिक  पंजाब में ही त्यागा गया है।5  लंगर की प्रथा भी श्रद्धालुओं को अपनी मेहनत की कमाई से मानवता की सेवा में लगाने को प्रेरित करती है. दान और कर सेवा सिख धर्म में भौतिक एवम शारीरिक सेवा का एक उज्जवल पक्ष माना गया है.6
दक्षिण भारत में तो छूत- अछूत का प्रश्न आज भी एक समस्या के रूप में मौजूद है और वहाँ अब भी सामाजिक  कारणों से अछूतों के मारे जाने के समाचार आते रहते हैं। उत्तर- प्रदेश, मध्यप्रदेश, राजस्थान आदि हिंदी  भाषी प्रांतों में स्वामी दयानंद और महात्मा गाँधी के प्रचार कार्य  के फलस्वरूप इस प्रकार के भेद- भाव की तीव्रता कम हो गई है और यद्यपि प्रत्यक्ष रूप में स्वीकार तो नहीं किया  जाता, पर व्यवहार में अछूतों को बहुत कुछ सुविधाएँ  मिल  गई हैं। बंगाल में सौ- डढ़े सौ वर्ष पूर्व  ब्रह्म- समाज के प्रचार ने परिस्थिति  को बहुत कुछ बदल दिया है। इस प्रकार समाज में से विषमता  को मिटाकर  समता तथा एकीकरण का जो महान् कार्य  गुरू नानक ने उठाया था, वह आज फलता- फूलता नजर आ रहा है, यह कम संतोष की बात नहीं है।7 
मोक्ष प्राप्ति के लिए भी गुरुओं ने परोपकार पर ही बल दिया है. बौद्धमत की तरह ही सिख धर्म में भी कोई एक व्यक्ति निजी मोक्ष ले लिए प्रयत्न नहीं करता जैसे की बौधिसत्व अपने कर्मों द्वारा प्रकाश प्राप्त कर असंख्य लोगों के लिए निर्वाण का मार्ग खोल देता है. गुरु नानक देव जी के विचार में “सहज” भाव हुकुम की निहित स्वीकृति है और यह सिख धर्म का मूल सिद्धांत है जोकि वह रहस्यवादी अवस्था है जिसमें अकालपुरख की इच्छा को स्वीकार कर लिया है. इस तरह यह स=इन्सान द्वारा प्राप्त करने वाली उच्चता अध्यात्मिक अवस्था है. गुरू नानक देव जी के अनुसार, “सहज शब्द का अर्थ है सम्पूर्ण संतुष्टि. जैसे धीमी आंच पर पकाया गया व्यंजन अपनी खुशबु को धारण किये रहता है इसी तरह मन और शरीर को स्व अनुशासन में धीरे धीरे लाना व्यक्ति के भीतर छुपे शाश्वत शुभ को उजागर करना है.
नानक जी भगवान् के विराट् रूप के उपासक थे, इसीलिए उन्हें संसार के सब पदार्थ और प्राणी भगवान् के रूप में ही दिखाई पड़ते थे। जब हम सब उसी एक अनादि- तत्त्व के अंश हैं तो आपस में लड़ाई- झगड़ा, ईष्यार्- द्वेष कैसा?  उन्होने एक ऐसा संगठन बनाने का निश्चय किया, जिसमें धर्म को व्यापार की चीज न बनाया जाये और जिसमें धार्मिकता और जातीयता की दृष्टि  से किसी को छोटा- बड़ा न माना जाय। इसीलिए  उन्होंने पृथक्- पृथक् पूजा- उपासना के स्थान पर सामुदयिक उपासना का प्रचलन किया।  उन्होंने अपने इस सिद्धांत  को वव्यवहारिक  रूप देने का दूसरा कार्य  यह किया की  सब लोगों का खाना एक साथ बने और सब एक ही पंगत में बैठकर भोजन करें। गुरू नानक ने अपने यहाँ लंगर- प्रथा प्रचिलत करके इसकी जड़ ही काट दी। इस तरह हम देखते है की मानववाद की जो अव्धारानाएं हमें वर्तमान में मिलती है वैसा मानववाद गुरु नानक देव जी के दर्शन का आधार रहा है.

संदर्भ :
  1. 1. शुभा दुबे, “गुरु नानक देव जी के यह दस उपदेश अपनाएँ, जीवन सफल बनाएँ” ,  नवंबर 3,2017, https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/adopt-ten-teachings-of-guru-nanak-dev-make-life-successful
  2. 2. गोपाल मिश्रा, श्री गुरु नानक देव के 10 अनमोल उपदेश, NOVEMBER 24, 2018, https://www.achhikhabar.com/2012/11/23/shree-guru-nanak-dev-ji-life-in-hindi/
  3. 3. वही.
  4. 4. डॉ शिवानी शर्मा , सिख नितिशास्त्र, फिलोसोफी, युसोल, पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़, 2011, पृष्ठ 30.
  5. 5. गुरू नानक की दार्शनिक  विचारधारा - गुरु नानक देव :: (All World Gayatri Pariwar), http://literature.awgp.org/book/guru_nanak_dev/v2.1
  6. 6. डॉ शिवानी शर्मा , सिख नितिशास्त्र, पृष्ठ 32.
  7. 7. गुरू नानक की दार्शनिक  विचारधारा, http://literature.awgp.org/book/guru_nanak_dev/v2.1




मंगलवार, 2 अक्टूबर 2018

The Dalit Movement in North India: Theory , Praxis and Challenges

The Dalit Movement in North India: Theory , Praxis and Challenges

Date: 
26-Nov-2018 to 28-Nov-2018

1. प्रस्तावित संगोष्ठी का शार्षक :
उत्तर भारत में दलित आंदोलन : सिद्धांत, व्यवहार एवं चुनौतियां
2. प्रस्तावित संगोष्ठी की संकल्पना
भारत में दलित आंदोलन की अवधारणा का आरम्भ गुलामी से मुक्ति की आंकाक्षाओं से हुआ है। इस संदर्भ में दलित आंदोलन ने न केवल दलित मुक्ति का प्रस्ताव रखा बल्कि उत्पीड़न और दलन की पीड़ा के शिकार आमजनों की मुक्ति की राह भी खोली है। राजनैतिक चेतना के उद्भव से पहले भारत में इस मुक्ति संघर्ष की परंपरा सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों के रूप में ही दिखाई देती है। लेकिन दलित मुक्ति के साथ-साथ व्यापक सामाजिक मुक्ति के लिए राजनीतिक चेतना का उद्भव आधुनिक भारत में ही संभव हुआ। यह दलित राजनीतिक चेतना जहाँ एक तरफ इतिहास और संस्कृति से निकली है वहीं यह हमारे समय के सामान्य नजरिये से ऊर्जा ग्रहण करती है। इसे हम बाबासाहेब डॉ.अम्बेडकर के लेखन और उनकी राजनीति में देख सकते हैं।
ब्रिटिश राज के विरूद्व भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान आज़ाद भारत में किसको कितनी आजादी मिली थी- के मुद्दों पर चल रही बहसों ने आधुनिक दलित आंदोलन की पृष्ठभूमि तैयार की जो वास्तव में कई विभिन्न आंदोलनों का समुच्चय है। जहाँ गाँधीवादी संघर्षां द्वारा दलितों की समस्याओं को सिर्फ समाज सुधार और कल्याण कार्यक्रमों तक सीमित रखा गया वहीं मार्क्सवादी विद्वानों ने अपने आपको वर्ग के प्रश्न तक सीमित रखा। इस सबके बीच, राष्ट्र और वर्ग से निकलकर दलित आंदोलन ने जाति आधारित अधीनस्थीकरण के बजाय अपने को मुक्ति के प्रश्न से जोड़ा। उत्तर औपनिवेशिक युग मेंं इस पर काफी जोर दिया जा रहा है। वास्तव में दलित आंदोलन सत्ता हथियाने, किसी प्रांत पर कब्जा करने या किसी राज्य के विस्तार का आंदोलन नहीं है। यह दलित समाज द्वारा अपनी गरिमा की रक्षा, सामाजिक शोषण और उत्पीड़न से छुटकारा पाने का आंदोलन है।
इस सबके बावजूद, राष्ट्रवादी एवं मार्क्सवादी नजरिये से प्रभावित मुख्यधारा की अकादमिक चिंताओं में दलित प्रश्न पर ध्यान नहीं दिया गया। मसलन, इतिहास को लीजिए। औपनिवेशिक इतिहास ने भारतीय समाज को अपरिवर्तनशील और रूढ़ समाज के रूप में चित्रित किया। इस प्रकार के इतिहास ने निम्नवर्गीय लोगों के संघर्ष एवं उनके आंदोलन को नगण्य माना एवं उनकी अवहेलना की और उसे एकीकृत राष्ट्र की कहानी में समाहित कर दिया। मार्क्सवादी इतिहास ने वर्ग को अपनी विश्लेषण की प्राथमिक इकाई माना है और इस तरह जाति का प्रश्न मार्क्सवादियो के लिए द्वितीयक ही रहा, जबकि जाति भारतीय समाज की एक विशेष प्रकार की वास्तविकता है। इसी प्रकार समाज विज्ञानों ने दलित प्रश्न को महत्त्व नहीं दिया।
दलित आंदोलनों ने इन विचारधाराओं द्वारा निर्मित कई मिथकों और शक्ति-संरचनाओं को तोड़ा है, जिससे वे इतने गहरे ढंग से जुड़े हैं कि उनकी उपस्थिति को सभी मान्यता दे रहे हैं। दलित आंदोलनों ने अपने संघर्षों के माध्यम से जाति आधारित शोषण को चुनौती दी है। दलितों के संघर्ष ने उन्हें मुख्यधारा के राजनीतिक शक्ति संरचना तंत्र में राह बनाने की ओर अग्रसर कर दिया है। उन्होंने परंपरागत शासक वर्गों पर सफलतापूर्वक दबाव भी बनाया है। इस कारण से, इन आंदोलनों और संघर्षां ने एकेडमिक क्षेत्र के बुद्धिजीवियों के एक हिस्से को इसके अध्ययन व समीक्षा हेतु बाध्य किया है। मुख्य रूप से दलित संघर्षां को केंद्र में रखने वाले दलित विमर्श ने समाज विज्ञान और मानविकी के सभी विषयों को प्रभावित किया है।
और बिल्कुल इसी समय, एक नवीन प्रकार की विद्वत्ता ने यह भी रेखांकित किया है कि पर्याप्त प्रगति के बावजूद दलित मुख्यधारा की राजनीति में दवाब समूह बनकर रह गए हैं। आमूलचूल सामाजिक परिवर्तन की धार कुंद पड़ती जा रही है। आज एक तरफ तो दलित आंदोलन में आंतरिक तनाव हैं तो दूसरी तरफ बाहरी चुनौतियाँ भी हैं। अन्य समस्याओं के साथ समाज में जाति को ज्यादा महत्व मिलना, लोकतांत्रिक और राज्य निर्देशित नीतियों की समस्या और वैश्वीकरण पूरे परिदृश्य को और भी जटिल बना रहे हैं। उत्तर अम्बेडकरवादी समकालीन दलित आंदोलन आगे तो गया है लेकिन वह नवीन दुविधाओं में फँस गया है।
इस परिप्रेक्ष्य में प्रस्तावित संगोष्ठी दलित आंदोलन से संबंधित नवीन शोधों और विचारों को एक साथ लाने का प्रयास है जिससे इसकी प्रकृति और व्यवहार, सफलताओं, दिक्कतों और चुनौतियों के बारे में बात की जा सके। विषय के विस्तार को देखते हुए इस
संगोष्ठी ने अपने आपको उत्तर भारत के दलित आंदोलन तक सीमित रखा है। लेकिन इसका आशय नहीं है कि इसने देश के दूसरे हिस्सों से इसके संबध को भुला दिया है।
निम्नलिखित प्रश्न एक दूसरे से संबद्ध हैं, इन उपविषयों के अंतर्गत संभावित शोधपत्र हो सकते हैं :
> दलित आंदोलनों से हम क्या समझ सकते है?
> उत्तर भारत में दलित आंदोलन का अब तक का क्या इतिहास रहा है?
> यह आंदोलन किन सिद्धांतों/विचारधाराओं/दृष्टिकोणों पर आधारित रहे हैं और इन्होंने दलित आंदोलन को कैसे रूप दिया और उसे आगे बढ़ाया है?
> उनका वास्तविक अनुभव क्या रहा है?
> उन्होंने किन समस्याओं का सामना किया है और उससे किस प्रकार मोलभाव किया है? और इससे उन्हें किस प्रकार की सफलताएँ मिली हैं?
> मुख्यधारा की राजनीति से दलित आंदोलन और दलित प्रश्न का संबंध कैसा रहा है?
> दलित आंदोलन की विविधता का क्या अर्थ और परिणाम रहा है?
> इतिहास और अस्मिता, सामाजिक परिवर्तन, लोकतंत्र और नागरिकता, राष्ट्र और राज्य, उदारीकरण और सांप्रदायिकता के मुद्दों से यह आंदोलन कैसे निपटते हैं?
> समकालीन दलित आंदोलन के विरोधाभास क्या हैं?
> उत्तर भारत के दलित आंदोलन को देश के अन्य भागों के दलित आंदोलन के साथ हम ठीक-ठीक कहाँ रख सकते हैं?
> जेंडर, वर्ग, अन्य पिछड़े वर्गां और आदिवासी जनों के प्रश्नों के साथ यह कैसे व्यवहार करता है?
> दलित प्रश्न और आंदोलन से समाज विज्ञान किस सीमा तक और किस तरीके से निपटता है?
> दलित अध्ययनों द्वारा किए गए हस्तक्षेप की प्रकृति क्या रही है? क्या इसे अपने आप में एक आंदोलन कहा जा सकता है?
> दलित प्रश्न और आंदोलनों को सांस्कृतिक व्यवहारों में किस प्रकार प्रस्तुत किया गया है?
उपर्युक्त उप विषयों पर शोधपत्र आमंत्रित किए जाते हैं। फौरी तौर पर इस गोष्ठी की संरचना और सत्रों के बारे में नीचे लिखा जा रहा है जिसे ध्यान में रखकर और पहले दिए गए प्रश्नों के आलोक में अपना शोधपत्र आगे बढ़ाएं।
उत्तर भारत के संदर्भ में
> दलित आंदोलनों का अध्ययन
> दलित आंदोलनों का इतिहास
> दलित आंदोलन में, और दलित आंदोलन का विचार
> दलित आंदोलन का व्यवहार, अनुभव और उसका प्रभाव
> दलित आंदोलनों की समस्याएँ, चुनौतियाँ और संभावनाएँ
> दलित आंदोलन में जेंडर, वर्ग, अन्य पिछड़े वर्गां और आदिवासी जनों के प्रश्न
> संस्कृति में दलित आंदोलन
> दलित आंदोलनों का देश के अन्य हिस्सों के आंदोलनों से संबंध और तुलनाएँ

तिथि : 26 से 28 नवम्बर 2018
स्थानः भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला
इस सगोष्ठी में सीमित संख्या में प्रतिभागियों को आमंत्रित किया जाएगा। इच्छुक प्रतिभागी अपने प्रस्तावित शोध पत्र के 500 शब्दों के शोध-सारांश और अपने आत्म-वृत्त को नीचे दिए गए ईमेल पर दिनांक 20 अक्टूबर 2018 तक भेज दें।

Dr. Ajay Kumar
Fellow
Indian Institute of Advanced Study
Rashtrapati Nivas, Shimla – 171005.
Mobile : 09415159762 E-mail: iiasajayk@gmail.com

Ms. Ritika Sharma
Academic Resource Officer
Indian Institute of Advanced Study
Rashtrapati Nivas, Shimla- 171005
Tel: 0177-2831385; +91-9044827297 (Mobile) Email: aro@iias.ac.in
चयनित प्रतिभागियों को संस्थान दिनांक 25 अक्टूबर 2018 तक आमंत्रण पत्र भेजेगा। यह संस्थान की नीति है कि वह सेमिनार की प्रोसीडिंग्स के बजाय शोधपत्र प्रकाशित करता है। इसलिए सभी आमंत्रित प्रतिभागियों से आशा की जाती है कि वे अपने पूर्ण, अप्रकाशित और मौलिक शोधपत्र संदर्भ सहित भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के अकादमिक संस्रोत अधिकारी को 20 नवम्बर 2018 तक भेज देंगे।
स्टाइल शीट के लिए संस्थान की बेबसाइट के इस पते पर जाएं : http://www.iias.org/ content/shss
सेमिनार की अवधि में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान प्रतिभागियों के ठहरने की व्यवस्था करेगा और वह भारत में आगमन के स्थान से लेकर शिमला तक वायुयान या रेल से आने-जाने का यात्रा व्यय भी अदा करेगा।
Link:
http://www.iias.ac.in/event/dalit-movement-north-india-theory-praxis-and-challenges

बुधवार, 23 दिसंबर 2015

Positive Philosophy of Swami Brahmananda Saraswati


Abstract
Since ancient times India is a place of tradition of saints, rishis, gurus and religious traditions. There are several religious sects, philosophies, traditions etc. which emphasis on different types of ideologies which developed here time to time. Six orthodox systems, three heterodox systems and several traditions of Vedanta tradition played an important role in imparting religious, philosophical teachings in this region. Various devotional poets, religious mendicants, renowned men and women of spirituality, and local holy men and women wear no religious tags, and their teachings and lives continue to be an example to the common realm of humanity.  Beside this several social revolutionary or social thinkers spread their ideas for social, religious, educational changes in the society. Within them Raja Ram Mohan Roy, Jyotiba Phule, Mahatma Gandhi, Rabindranath Tagore, Swami Dayanand, Swami Vivekananda, Dr. B.R. Ambedkar, S. Radhakrishnan, Raman Maharishi etc. Swami Brahmananda Saraswati is one from the religious-Vedanta tradition who contributed through his religious teachings and social activities. Here we will study his basic ideas which are important for our society and nation.

Published:
ü  “Positive Philosophy of Swami Brahmananda Saraswati” in Darshan Jyoti: Refereed Annual Philosophical Research Journal, Year 05, No.01, September, 2015-August-2016, pp. 124-130 (ISSN: 2249-1196).

बुधवार, 2 जुलाई 2014

RESEARCH BOOKS BY PROF. SOHAN RAJ TATER


Prof. (Dr.) Sohan Raj Tater (b. 1947) is former Vice Chancellor, Singhania University, Pacheri Bari (Jhunjhunu), Rajasthan and former Adviser, Jain Vishva Bharati University, Ladnun (Raj.). He is Emeritus Professor in Trinity World University (U.K.), NAIU (U.S.A.),Jagannath University(Bangladesh), Jodhpur National, JJTU and Singhania University. He is registered Research Supervisor in Abroad and Indian Universities in subjects – Philosophy, Yoga and Education. 25 Scholars have already been awarded Ph.D. in his supervision. Earlier he served in Public Health Engineering Department, Government of Rajasthan, for 30 years and took voluntary retirement from the post of Superintending Engineer. He is Associate member, Patron, Fellow and Life member in various Academic/Social institutes in India and Abroad. He has traveled abroad- U.S.A.,U.K.,Japan, Germany, South Korea, Bangladesh, Sri Lanka, Nepal and Bhutan countries. A well-known scholar Prof. (Dr.) Sohan Raj Tater has written and got published 75 books and 15 books are under publication in his subjects – Philosophy, Yoga and Education. Besides this his more than 70 Research papers published in National and International journals of repute. Also, he has participated in more than 60 seminars, conferences, workshops, symposias and Endowment Lectures in India and Abroad. He has been awarded with Indira Gandhi Rastriya Akta Award, Samaj Bhushan, Yuvak Ratna, Indo- Nepal Harmony, Bharat Excellence Award, Jain Gyan Vigyan Manishi, Samaj Ratna, Maharshi Patanjali International Award, Indo- Bhutan, Vidhya Bhushan, Naturopathy Ratna and Yoga Ratna National awards. 
Website:
http://www.drsohanrajtater.com/

You may download his full profile and details of research work from  here:
http://www.scribd.com/doc/232412114/Research-Books-by-Prof-Dr-Sohan-Raj-Tater